
हिमाचल प्रदेश के सबसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला-2026 का आज चंबा में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य शुभारंभ हो गया। राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने भगवान लक्ष्मीनारायण और भगवान रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित कर प्रदेश की सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सदियों पुरानी इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानते हैं मिंजर मेले का इतिहास।
नगर परिषद परिसर से निकली भव्य शोभायात्रा में ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोक संस्कृति की शानदार झलक देखने को मिली। राज्यपाल ने ऐतिहासिक चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले का औपचारिक शुभारंभ किया। पूरे शहर में उत्सव और श्रद्धा का माहौल रहा।
मान्यता है कि चंबा रियासत के शुरुआती दौर में किसी बड़ी विजय और भरपूर फसल की खुशी में लोगों ने राजा का स्वागत धान और मक्की की बालियों के प्रतीक ‘मिंजर’ से किया था। यही परंपरा समय के साथ एक विशाल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव बन गई, जिसे आज पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला के नाम से जानती है।
मिंजर रेशमी धागों से बनी एक विशेष लटकन होती है, जो धान और मक्की की नई बालियों का प्रतीक मानी जाती है। इसे समृद्धि, खुशहाली और अच्छी फसल का शुभ संकेत माना जाता है। मेले के दौरान लोग इसे अपने वस्त्रों पर धारण करते हैं और मंदिरों में अर्पित करते हैं।
मेले का समापन भी बेहद खास होता है। अंतिम दिन विशाल शोभायात्रा रावी नदी के तट तक पहुंचती है, जहां मिंजर, नारियल, मौसमी फल और शुभ सामग्री नदी में अर्पित की जाती है। यह परंपरा प्रकृति के प्रति आभार और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक मानी जाती है।
26 जुलाई से 2 अगस्त तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय मेले में लोकनृत्य, लोकसंगीत, सांस्कृतिक संध्याएं, खेल प्रतियोगिताएं, हस्तशिल्प प्रदर्शनी और स्थानीय व्यंजनों का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। देश-विदेश से हजारों पर्यटक और श्रद्धालु इस ऐतिहासिक मेले में हिस्सा लेने चंबा पहुंचेंगे।
मिंजर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंबा की संस्कृति, कृषि परंपरा, सामाजिक समरसता और भाईचारे की जीवंत पहचान है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को पूरी दुनिया तक पहुंचा रही है।




