सरकारी बंगलों में पूर्व सीपीएस का ठहराव बना विवाद, हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा आधार


शिमला। हिमाचल प्रदेश में पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) को सरकारी आवास में ठहराव की अनुमति देने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। छह पूर्व सीपीएस को बिना आवेदन किए सरकारी बंगलों में रहने को नियमित करने के सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मुख्य सचिव से इस मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 4 मई 2026 को जारी सरकारी आदेश पर सवाल उठाए। इस आदेश के तहत पूर्व सीपीएस के सरकारी आवासों में 14 नवंबर 2024 से सामान्य लाइसेंस शुल्क पर ठहराव को नियमित किया गया था। खास बात यह है कि संबंधित पूर्व सीपीएस ने इसके लिए कोई आवेदन नहीं किया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि इस तरह की विशेष छूट देने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि मामले में पहले नोटिस जारी नहीं किया जाता तो संभव है कि पूरा मुद्दा सामने ही नहीं आता।
मुख्य सचिव को तीन सवालों का देना होगा जवाब
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि पूर्व सीपीएस को दी गई विशेष छूट किस आधार पर दी गई। अदालत ने मुख्य सचिव को हलफनामा दाखिल कर तीन अहम बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
- क्या इससे पहले किसी सामान्य सरकारी कर्मचारी को इसी तरह की विशेष अनुमति या छूट दी गई है?
- बिना आवेदन किए छह पूर्व सीपीएस को यह विशेष सुविधा किस आधार पर प्रदान की गई?
- संबंधित आवासों के लिए कितना दंडात्मक किराया बनता है, इसकी सटीक राशि क्या है?
अदालत ने 4 मई के विवादित सरकारी आदेश को रिकॉर्ड पर लिया है और संबंधित मूल फाइल सरकार को वापस कर दी है। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त 2026 को होगी।
2023 में बनाए गए थे छह सीपीएस
हिमाचल सरकार ने जनवरी 2023 में छह कांग्रेस विधायकों को मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त किया था। इनमें संजय अवस्थी, सुंदर सिंह ठाकुर, मोहन लाल ब्राक्टा, राम कुमार चौधरी, आशीष बुटेल और किशोरी लाल शामिल थे।
इन नियुक्तियों को भाजपा की ओर से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। 13 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट ने छहों सीपीएस की नियुक्तियों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था और उन्हें दी गई सरकारी सुविधाएं वापस लेने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद सरकारी आवासों में उनके ठहराव को नियमित करने के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया। अब हाईकोर्ट ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि नियमों के तहत ऐसी विशेष छूट देने का आधार क्या था।




