हिमाचल: बागवानी की सीख देने वाली नौणी यूनिवर्सिटी की 397.27 हेक्टेयर जमीन खेती से बाहर, सामने आया बड़ा सवाल


पूरी खबर:
हिमाचल: बागवानों को करोड़ों की कमाई का उपदेश, नौणी यूनिवर्सिटी की 397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग में नहीं
सोलन, हिमाचल प्रदेश। हिमाचल प्रदेश में बागवानी किसानों और बागवानों को आधुनिक तकनीकों के माध्यम से बेहतर उत्पादन और आमदनी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी बीच डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी से जुड़ा भूमि उपयोग का मामला चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय की 397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग में नहीं है। इस आंकड़े ने भूमि के इस्तेमाल और कृषि-बागवानी की संभावनाओं को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग से बाहर
नौणी विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश में बागवानी और वानिकी शिक्षा, अनुसंधान तथा किसानों को तकनीकी जानकारी देने वाली प्रमुख संस्था है। ऐसे में विश्वविद्यालय की भूमि का उपयोग किस प्रकार हो रहा है, यह महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। 397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग में नहीं होने का आंकड़ा सामने आने के बाद भूमि के वर्तमान इस्तेमाल, उसकी स्थिति और भविष्य में उसके संभावित उपयोग को लेकर चर्चा हो सकती है।
बागवानों की आमदनी बढ़ाने पर जोर
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में बागवानी की महत्वपूर्ण भूमिका है। सेब सहित विभिन्न फलों और अन्य बागवानी फसलों से बड़ी संख्या में किसान जुड़े हुए हैं। किसानों को आधुनिक तकनीक, बेहतर पौध सामग्री और वैज्ञानिक तरीकों के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने की सलाह दी जाती है। ऐसे में कृषि और बागवानी से संबंधित संस्थानों की भूमि का प्रभावी उपयोग भी अहम माना जाता है।
भूमि के इस्तेमाल पर उठ रहे सवाल
इस मामले में यह जानना जरूरी है कि संबंधित भूमि खेती के उपयोग में क्यों नहीं है, क्या उसका इस्तेमाल अनुसंधान, वानिकी, संरक्षण या किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जा रहा है और क्या उसके कुछ हिस्सों को भविष्य में कृषि-बागवानी गतिविधियों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। इन सवालों के जवाब विश्वविद्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड और भूमि उपयोग संबंधी विस्तृत जानकारी से ही स्पष्ट होंगे।
आगे क्या हो सकता है?
नौणी विश्वविद्यालय की भूमि से जुड़ा यह आंकड़ा कृषि-बागवानी संस्थानों में उपलब्ध संसाधनों के उपयोग पर चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि, खेती के उपयोग में नहीं होने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि पूरी भूमि खाली या अनुपयोगी पड़ी है। भूमि की वास्तविक स्थिति, उसके निर्धारित उद्देश्य और उपयोग से संबंधित आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही इस मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।




