हिमाचल में अब AI खोलेगा नशा तस्करी के नेटवर्क का राज! मोबाइल, बैंकिंग और सोशल मीडिया डेटा से जुड़ेंगी कड़ियां

शिमला: हिमाचल में चिट्टा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए पुलिस जांच में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिसिस का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा। इसका उद्देश्य केवल नशे के साथ पकड़े गए आरोपी तक कार्रवाई सीमित रखने के बजाय उसके पीछे मौजूद सप्लायर और पूरे नेटवर्क तक पहुंचना है।
नेशनल एंटी-नार्कोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) की ओर से राज्यों को नशा तस्करी के पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसी दिशा में हिमाचल पुलिस डिजिटल फॉरेंसिक, डार्क वेब मॉनिटरिंग, वित्तीय लेनदेन की जांच और अलग-अलग मामलों के डेटा को आपस में जोड़कर तस्करी नेटवर्क की पहचान करने पर काम करेगी।
मोबाइल से बैंकिंग लेनदेन तक खंगाला जाएगा डेटा
जांच के दौरान अलग-अलग मामलों में सामने आए मोबाइल नंबर, संपर्क, वाहनों, बैंकिंग लेनदेन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाएगा। AI आधारित डेटा एनालिसिस से बड़ी मात्रा में उपलब्ध जानकारी के बीच आपस में जुड़ी कड़ियों और संदिग्ध पैटर्न की पहचान करने में पुलिस को मदद मिल सकती है।
गिरफ्तार आरोपियों से बरामद मोबाइल फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी जांच का अहम हिस्सा होंगे। डिजिटल फॉरेंसिक के माध्यम से कानून के तहत प्राप्त डेटा का विश्लेषण कर संपर्क, डिजिटल संचार और अन्य प्रासंगिक साक्ष्यों की जांच की जा सकेगी।
अगर अलग-अलग आरोपियों के मोबाइल या अन्य उपकरणों में समान संपर्क और डिजिटल कड़ियां सामने आती हैं, तो पुलिस को संभावित नेटवर्क की संरचना समझने में मदद मिल सकती है।
दूसरे राज्यों तक पहुंच सकती है जांच
तकनीकी जांच के जरिए बैकवर्ड लिंकेज का पता लगाने पर भी जोर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि नशे की खेप के साथ पकड़े गए व्यक्ति से आगे उसके सप्लायर और नेटवर्क से जुड़े लोगों तक जांच पहुंचाने की कोशिश होगी।
हिमाचल के अलग-अलग जिलों में दर्ज NDPS मामलों के डेटा का एक साथ विश्लेषण कर संभावित कड़ियों की पहचान की जा सकेगी। शिमला, कांगड़ा, कुल्लू, सोलन और ऊना में सामने आए मामलों के बीच मोबाइल संपर्क, वित्तीय लेनदेन और अन्य समानताओं को देखा जा सकता है। इसके साथ ही पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से जुड़ी संभावित कड़ियों का भी विश्लेषण किया जाएगा।
डार्क वेब और सोशल मीडिया पर भी नजर
नशे की ऑनलाइन खरीद-फरोख्त के लिए इंटरनेट के छिपे हिस्से यानी डार्क वेब और सोशल मीडिया के इस्तेमाल की आशंका को देखते हुए इन प्लेटफॉर्म पर मॉनिटरिंग बढ़ाने की तैयारी है।
विशेष साइबर टीमें संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों और उपलब्ध डिजिटल संकेतों का विश्लेषण कर सकती हैं। इन संकेतों को अन्य डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों से मिलाकर यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि किसी गतिविधि के पीछे वास्तविक व्यक्ति या नेटवर्क कौन है।
हालांकि पुलिस जांच में AI की भूमिका मुख्य रूप से संभावित कड़ियों और संदिग्ध पैटर्न की पहचान तक रहेगी। AI से मिलने वाला कोई संकेत अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं होगा। कानूनी कार्रवाई के लिए स्वतंत्र जांच और सत्यापित साक्ष्य जरूरी होंगे।
डीजीपी हिमाचल अशोक तिवारी के अनुसार, AI और डेटा एनालिटिक्स के जरिए अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली सूचनाओं को जोड़कर सप्लाई नेटवर्क की पहचान करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि बैकवर्ड लिंकेज की पहचान पर पहले से काम चल रहा है और इसके अच्छे परिणाम भी मिल रहे हैं।
यानी आने वाले समय में हिमाचल पुलिस की जांच सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहेगी कि नशा किसके पास मिला, बल्कि तकनीकी विश्लेषण के जरिए यह जानने की कोशिश भी होगी कि नशा आया कहां से, किस-किस से संपर्क हुआ और इसके पीछे पूरा नेटवर्क कौन चला रहा है।




