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किशाऊ बांध बना तो बदल जाएगी पूरी तस्वीर! रोजगार के साथ डूबेंगे गांव, खेत और पीढ़ियों की यादें

शिमला/सिरमौर। हिमाचल-उत्तराखंड सीमा पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने के बाद अब प्रभावित क्षेत्रों में हलचल बढ़ गई है। परियोजना से प्रदेश को आर्थिक लाभ और रोजगार के अवसर मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन दूसरी ओर जलाशय बनने से कई गांवों, खेतों, घरों और वर्षों पुरानी विरासत के प्रभावित होने की चिंता भी सामने आ रही है।

टौंस नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना की झील की जद में आने वाले क्षेत्रों के लोगों के लिए यह केवल जमीन छोड़ने का सवाल नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक उनकी पुश्तैनी जमीन में कई पीढ़ियों की यादें, परिवारों का इतिहास, पुराने घर, खेत, रास्ते और देवस्थल जुड़े हुए हैं। ऐसे में विस्थापन की आशंका के साथ विकास और विरासत दोनों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

पुश्तैनी जमीन सिर्फ जमीन नहीं

प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीण इंद्र सिंह, बाजूराम, विजय सिंह, शुपाराम, भीम सिंह, कल्याण सिंह और गुलाब सिंह का कहना है कि उनके लिए पुश्तैनी जमीन महज जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनकी पहचान और विरासत है।

इन्हीं खेतों में उनके पूर्वजों ने जीवन बिताया और परिवारों को आगे बढ़ाया। पुराने घरों और आंगनों से कई पीढ़ियों की यादें जुड़ी हैं। ग्रामीणों की चिंता है कि अगर जलाशय बनता है तो आने वाली पीढ़ियां शायद अपने पुराने गांव और घरों को केवल तस्वीरों या बुजुर्गों की यादों के जरिए ही जान पाएंगी।

हिमाचल के सात राजस्व गांव और 14 उपगांव प्रभावित होने की जानकारी

परियोजना से हिमाचल के सात राजस्व गांव और 14 उपगांव प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। शिलाई क्षेत्र के मोहराड़, मश्वाड़, कुसेनु, डूडोग, चाकरी, नेरा, सियासु, मिनस, जिलूर, सांग और जामली समेत कई गांव और उपगांव इसकी जद में आने की बात कही गई है।

वहीं उत्तराखंड के शम्भर-मेलोथ, मझगांव, कोटा, बोहग, सेंज, पाटन, मिनस और रामढूंगा सहित अन्य क्षेत्र भी प्रस्तावित जलाशय से प्रभावित होने की जानकारी है।

भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के प्रावधानों के तहत प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास की सुविधा मिलने की बात है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि असली चिंता केवल जमीन की कीमत नहीं, बल्कि उस जगह से जुड़ी पीढ़ियों की पहचान और जीवनशैली की है।

मकान दोबारा बन जाएगा, लेकिन पुराना आंगन कैसे मिलेगा?

जलाशय में प्रभावित होने का मतलब सिर्फ मकानों का डूबना नहीं होगा। इसके साथ खेत-खलिहान, पुराने रास्ते, स्कूल, मंदिर, पूजा स्थल और गांवों का सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित हो सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजे से जमीन की कीमत मिल सकती है, लेकिन उस मिट्टी से जुड़ी यादों की कीमत तय नहीं की जा सकती। नई जगह पर नया मकान बनाया जा सकता है, लेकिन वह पुराना आंगन दोबारा नहीं बनाया जा सकता जहां कई पीढ़ियों ने अपना बचपन बिताया।

देवस्थलों को लेकर भी चिंता

प्रभावित क्षेत्रों में कई पुराने देवस्थल और पूजा स्थल स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़े हैं। इन स्थानों पर वर्षों से धार्मिक परंपराएं निभाई जाती रही हैं।

परियोजना का जलाशय बनने की स्थिति में इन देवस्थलों के प्रभावित होने की भी आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों के लिए यह केवल किसी भवन के डूबने का मामला नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा विषय है।

किशाऊ नाम पर भी उठे सवाल

परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन जौनसार-बावर क्षेत्र में इसके नाम को लेकर भी आपत्ति के स्वर सामने आए हैं।

किशाऊ बांध संघर्ष समिति का कहना है कि किशाऊ गांव प्रस्तावित बांध स्थल से करीब 15 किलोमीटर दूर है और परियोजना में किशाऊ गांव की जमीन शामिल नहीं है। समिति के अनुसार प्रस्तावित बांध चकराता तहसील के शम्भर-मेलोथ क्षेत्र में है। समिति ने परियोजना के नाम को क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने की मांग की है।

पुनर्वास में सिर्फ मकान नहीं, पूरी जिंदगी का ध्यान रखने की मांग

परियोजना आगे बढ़ने के साथ प्रभावित परिवारों के बीच मुआवजे और पुनर्वास को लेकर चर्चा भी तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि पुनर्वास सिर्फ नया मकान देने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

उनकी कृषि भूमि, आजीविका, सामाजिक रिश्तों, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक पहचान को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। कई परिवारों के लिए पुश्तैनी जमीन ही रोजी-रोटी का प्रमुख आधार है। ऐसे में विस्थापन के बाद नई जगह बसना उनके लिए केवल घर बदलना नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली बदलने जैसा होगा।

दशकों पुरानी परियोजना अब जमीन पर आने की ओर

किशाऊ बांध परियोजना का इतिहास कई दशक पुराना बताया जाता है। जानकारी के अनुसार 1940 के दशक में इस क्षेत्र में बांध निर्माण को लेकर प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच शुरू हुई थी। पहाड़ों की मजबूती और भूगर्भीय स्थिति जांचने के लिए परीक्षण सुरंगों और ड्रिलिंग का काम भी किया गया था।

बताया जाता है कि 1960 के दशक में सामने आई वैज्ञानिक रिपोर्टों में मूल किशाऊ स्थल को बांध निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। इसके बाद प्रस्तावित स्थल को शम्भर-मेलोथ और चामड़ा-मोहराड़ क्षेत्र की ओर स्थानांतरित किया गया। इसके बाद भी कई वर्षों तक तकनीकी और भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण चलते रहे, जबकि परियोजना का नाम किशाऊ ही बना रहा।

अब परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन होने के बाद प्रभावित इलाकों में एक तरफ विकास, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ उन परिवारों के सामने पुश्तैनी जमीन, गांव और विरासत छोड़ने का सवाल खड़ा हो गया है।

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