हिमाचल में भांग की खेती को लेकर नई नीति लागू, एक बीघा के लिए आवेदन शुरू; कपड़े, शॉल और औषधीय उपयोग पर रहेगा फोकस


कुल्लू, 9 सितंबर 2026। हिमाचल प्रदेश में भांग की खेती को लेकर सरकार की नीति लागू हो गई है। अब किसान और अन्य इच्छुक लोग निर्धारित प्रक्रिया के तहत भांग की खेती के लिए आवेदन कर सकेंगे। कुल्लू सदर विधायक सुंदर सिंह ठाकुर ने मीडिया से बातचीत में बताया कि इसके तहत प्रति बीघा के हिसाब से आवेदन किया जा सकेगा।
विधायक ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में भांग की खेती को नशे के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। सरकार का फोकस ऐसी भांग की खेती पर रहेगा, जिसका इस्तेमाल औद्योगिक, कपड़ा और औषधीय जरूरतों के लिए किया जा सके।
नशे के बजाय रोजगार पर जोर
सुंदर सिंह ठाकुर ने कहा कि भांग के रेशे से कपड़े और शॉल जैसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक खेती के साथ लोगों को रोजगार का एक नया विकल्प मिल सकता है।
उन्होंने बताया कि जिन पौधों में औषधीय गुण होंगे, उनके उपयोग के लिए प्रदेश में उद्योग स्थापित करने की योजना है। इसके लिए बड़ी कंपनियों को हिमाचल में निवेश के लिए आकर्षित किया जाएगा। विधायक के अनुसार, डाबर जैसी कंपनियां भी प्रदेश में यूनिट स्थापित करने के लिए आगे आ सकती हैं।
अगर खेती, प्रसंस्करण और उत्पाद निर्माण को एक साथ जोड़ा जाता है तो इससे किसानों के साथ-साथ स्थानीय युवाओं के लिए भी रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
ग्रामीण स्तर पर किया जाएगा प्रचार
विधायक ने कहा कि इस नीति के बारे में ग्रामीण स्तर तक लोगों को जानकारी दी जाएगी। किसानों को बताया जाएगा कि किस प्रकार की भांग की खेती की अनुमति होगी और इसका उपयोग किन क्षेत्रों में किया जा सकेगा।
सरकार की योजना ऐसे लोगों के लिए भी वैकल्पिक रोजगार के अवसर तैयार करने की है, जो लंबे समय से भांग और इससे जुड़े काम पर निर्भर रहे हैं। हालांकि, खेती के दौरान निर्धारित नियमों और प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होगा।
कपड़े से लेकर औषधीय उत्पादों तक इस्तेमाल
भांग के रेशे का इस्तेमाल कपड़े, शॉल और अन्य उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। वहीं औषधीय गुणों वाली भांग से दवाइयों तथा अन्य औद्योगिक उत्पादों के लिए कच्चा माल तैयार करने की संभावनाएं भी हैं।
ऐसे में हिमाचल सरकार की नई नीति को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए वैकल्पिक रोजगार मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि इसका वास्तविक लाभ खेती, प्रसंस्करण और उद्योगों को प्रभावी तरीके से जोड़ने तथा नियमों के सख्त पालन पर निर्भर करेगा।




