हाईकोर्ट ने तलाकनामे को लेकर सुनाया अहम फैसला, स्टांप पेपर पर लिख देने से खत्म नहीं होता विवाह; कोर्ट की मंजूरी जरूरी


शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाकनामे को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत केवल स्टांप पेपर पर तलाकनामा लिख देना अपने आप में वैध तलाक नहीं माना जा सकता। इसके लिए अदालत की मंजूरी जरूरी है या फिर जिस प्रथा के आधार पर तलाक का दावा किया जा रहा है, उसे ठोस साक्ष्यों के साथ साबित करना होगा।
न्यायाधीश राकेश कैंथला ने चंबा जिले से जुड़े एक पुराने भूमि विवाद मामले में दायर अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। मामले में अदालत ने मृतक श्रीधर की ओर से बनाई गई पंजीकृत वसीयत को भी वैध माना।
25 साल पुराने विवाद में सामने आया मामला
यह विवाद श्रीधर की मृत्यु के बाद उनकी जमीन के मालिकाना हक को लेकर शुरू हुआ था। वादी भिंद्रो ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दावा किया था कि श्रीधर ने 11 सितंबर 1997 को उसके पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत की थी।
मामले में यह भी दावा किया गया कि श्रीधर ने अपनी पहली पत्नी कांतो को 21 मई 1976 को तलाक दे दिया था। इसके बाद कांतो ने शिव राम नामक व्यक्ति से दूसरी शादी कर ली थी।
वहीं, कांतो ने खुद को श्रीधर की कानूनी विधवा बताते हुए अपनी बेटी को उनका वारिस बताया और वसीयत को फर्जी एवं संदेहास्पद करार दिया।
प्रथागत तलाक का नहीं मिला पुख्ता सबूत
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि कथित पारंपरिक तलाक को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रथागत तलाक को केवल किसी दस्तावेज या स्टांप पेपर के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यदि कोई पक्ष प्रथा के आधार पर तलाक का दावा करता है तो उसे अदालत के सामने विश्वसनीय गवाहों और पर्याप्त साक्ष्यों के जरिए यह साबित करना होगा कि संबंधित समुदाय में ऐसी प्रथा वास्तव में मान्य और प्रचलित है।
पंजीकृत वसीयत को कोर्ट ने माना वैध
अदालत ने श्रीधर की पंजीकृत वसीयत की भी जांच की और पाया कि इसे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार तैयार किया गया था।
वसीयत पर श्रीधर ने गवाहों की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए थे। अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस वजह से वसीयत को संदेहास्पद नहीं माना जा सकता कि उसका लाभार्थी उसके निष्पादन के समय मौजूद था।
हाईकोर्ट ने इन तथ्यों के आधार पर अपील को खारिज कर दिया और वसीयत को वैध माना।




