
देवभूमि हिमाचल में मानसून अब सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि हर साल लौटने वाली एक भयावह त्रासदी बन चुका है। पिछले छह वर्षों में बारिश, बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ ने 2108 लोगों की जान ले ली, जबकि हजारों परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। करोड़ों नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति तबाह हो चुकी है। सवाल यह है कि आखिर कब तक हिमाचल हर साल इस तबाही का दर्द झेलेगा?
हिमाचल प्रदेश में मानसून अब बारिश नहीं, बल्कि एक जानलेवा आपदा का रूप ले चुका है। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2018 से 2025 के बीच मानसूनी आपदाओं में 2108 लोगों की मौत हो चुकी है।
वर्ष 2023 प्रदेश के इतिहास की सबसे भयावह आपदाओं में दर्ज हुआ, जब अतिवृष्टि, बाढ़ और भूस्खलन ने 428 लोगों की जान ले ली। हजारों मकान, पुल और सड़कें बह गईं तथा आर्थिक नुकसान 5000 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया।
इसके बाद 2025 भी कम खतरनाक नहीं रहा। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2025 तक 468 लोगों की मौत दर्ज की गई। सबसे ज्यादा तबाही मंडी, चंबा, कांगड़ा और शिमला जिलों में देखने को मिली, जहां बादल फटने और भूस्खलन ने भारी नुकसान पहुंचाया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, अनियोजित निर्माण और नदी-नालों के किनारे बढ़ता दबाव हिमाचल को पहले से कहीं अधिक संवेदनशील बना रहा है।
इस बार का मानसून भी डराने वाला है। प्रदेशभर में लगातार भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने की घटनाएं सामने आ रही हैं। सैकड़ों सड़कें बंद, बिजली और पेयजल व्यवस्था प्रभावित है, जबकि मौसम विभाग कई बार रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी कर चुका है।
हर साल बारिश आती है… लेकिन अपने साथ मौत, तबाही और बेघर होते हजारों परिवारों की दर्दनाक कहानी भी छोड़ जाती है। बड़ा सवाल यही है—क्या हिमाचल हर मानसून में ऐसी ही तबाही झेलता रहेगा, या अब स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे?




