Himachal: पहाड़ों के दरकने से सबक, अब बदलेगा सड़कों की कटिंग का तरीका; IIT मंडी ने दिए ये सुझाव


हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों के लगातार दरकने और भूस्खलन की घटनाओं से सबक लेते हुए अब ग्रामीण सड़कों के निर्माण का तरीका बदलने की तैयारी है। आईआईटी मंडी ने ग्रामीण सड़कों के लिए तैयार गाइडलाइन में ड्रेनेज को पहली प्राथमिकता देने और संवेदनशील क्षेत्रों में विस्तृत जियोटेक्निकल जांच के बाद ही निर्माण कार्य करने की सिफारिश की है।
अध्ययन में करीब 207 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 647 भूस्खलनों का अध्ययन किया गया। इसमें सामने आया कि जरूरत से ज्यादा सीधी कटिंग, खराब जल निकासी, मलबे की गलत डंपिंग और रखरखाव की कमी सड़कों को अस्थिर कर रही है।
वर्ष 2023 से हिमाचल में प्राकृतिक आपदा, भारी बारिश और भूस्खलन की घटनाओं के कारण सड़कों को लगातार नुकसान हो रहा है। मानसून के दौरान सड़कें धंसने और टूटने से लोक निर्माण विभाग को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। इसी को देखते हुए नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एजेंसी ने आईआईटी मंडी से यह अध्ययन करवाया है।
तीन श्रेणियों में बांटे जाएंगे जोखिम वाले क्षेत्र
गाइडलाइन में सड़क के हिस्सों को कम, मध्यम और अधिक संवेदनशीलता वाले जोखिम वर्गों में बांटने का सुझाव दिया गया है। कम जोखिम वाले क्षेत्रों में सामान्य इंजीनियरिंग और नियमित रखरखाव पर्याप्त होगा। मध्यम जोखिम वाले क्षेत्रों में नियंत्रित कटिंग, बेहतर ड्रेनेज और बायोइंजीनियरिंग उपाय अपनाने होंगे।
हाई रिस्क ढलानों पर विस्तृत जियोटेक्निकल जांच, स्लोप स्टेबिलिटी विश्लेषण, इंजीनियर्ड रिटेनिंग स्ट्रक्चर और लगातार निगरानी जरूरी होगी। जोखिम तय करते समय आबादी, सड़क कनेक्टिविटी और पुराने भूस्खलनों के रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखने की सिफारिश की गई है।
ब्लाइंड वर्टिकल कट से बचने की सलाह
गाइडलाइन में ब्लाइंड वर्टिकल कट यानी पहाड़ी को सीधे और जरूरत से ज्यादा खड़ा काटने से बचने की सलाह दी गई है। पर्याप्त जल निकासी नहीं होने पर बारिश का पानी ढलान में पहुंचकर अस्थिरता बढ़ा देता है।
सड़क किनारे या ढलान के नीचे खुदाई से निकला मलबा डालना भी खतरे को बढ़ाता है। इसलिए मलबे को पहले से चिह्नित सुरक्षित स्थानों पर डालने और ढलान के ऊपर तथा नीचे दोनों तरफ अस्थिर हिस्सों का उपचार करने पर जोर दिया गया है।
तीन चरणों में होगी निगरानी
गाइडलाइन में प्री-मानसून, मानसून और पोस्ट-मानसून निरीक्षण की व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की गई है। मानसून से पहले सड़क किनारे नालियों, ड्रेन और आउटलेट की सफाई के साथ दरारों और रिसाव वाले स्थानों की जांच करनी होगी।
बारिश के दौरान संवेदनशील स्थानों की बार-बार निगरानी और ड्रेनेज में आई रुकावट को तत्काल दूर करने की जरूरत बताई गई है। भविष्य की सड़क परियोजनाओं में नए वर्षा रिकॉर्ड और संभावित चरम परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ड्रेनेज और ढलान सुरक्षा की योजना बनाने की सिफारिश की गई है
52 पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों को दिया प्रशिक्षण
पीएमजीएसवाई के तहत सुरक्षित सड़क निर्माण को लेकर आईआईटी मंडी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशुतोष कुमार और डॉ. उदय कला ने पीडब्ल्यूडी के 52 इंजीनियरों को कार्यशाला के माध्यम से प्रशिक्षण दिया। इसमें ढलान प्रबंधन, जल निकासी और सड़क सुरक्षा से जुड़े व्यावहारिक और वैज्ञानिक पहलुओं की जानकारी दी गई।
लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर इन चीफ नरेंद्र पाल के अनुसार इंजीनियरों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है और आगे गाइडलाइन के अनुसार ही सड़कों का निर्माण कार्य किया जाएगा।



