किशाऊ बांध को लेकर दिल्ली में बड़ा समझौता, शिलाई के 8 गांवों पर पड़ेगा असर… 2,092 लोगों का होगा पुनर्वास


शिमला/शिलाई। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर प्रस्तावित बहुउद्देशीय किशाऊ बांध परियोजना को लेकर मंगलवार को दिल्ली में अहम समझौता हुआ है। ऊपरी यमुना बेसिन में टोंस नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना की क्षमता 660 मेगावाट है। परियोजना से हिमाचल प्रदेश के शिलाई क्षेत्र के आठ गांवों के 2,092 लोगों और उत्तराखंड के नौ गांवों के 3,406 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता होगी।
किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है और हिमाचल-उत्तराखंड की सीमा भी बनाती है। परियोजना का उद्देश्य छह राज्यों में सिंचाई, पेयजल और जल प्रबंधन को मजबूत करने के साथ जलविद्युत उत्पादन बढ़ाना है।
8 गांवों के 2,092 लोग होंगे प्रभावित
किशाऊ कॉरपोरेशन के आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में परियोजना से शिलाई क्षेत्र के मोहराड़, मशवाड़, कंड्यारी, नेरा, बड़ालानी, सियासु, थनाणा और धारवा गांव प्रभावित संभावित गांवों में शामिल हैं। इन गांवों के कुल 2,092 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता होगी।
परियोजना के कारण हिमाचल प्रदेश में करीब 1,498 हेक्टेयर और उत्तराखंड में करीब 1,452 हेक्टेयर क्षेत्र के जलमग्न होने का अनुमान है। यानी दोनों राज्यों में कुल करीब 2,950 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित होने की संभावना है।
660 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना
परियोजना में 1,324 मिलियन घन मीटर लाइव स्टोरेज क्षमता के साथ 660 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन का प्रावधान है। मूल प्रस्ताव के अनुसार परियोजना से करीब 1,379 मिलियन यूनिट वार्षिक ऊर्जा उत्पादन होने का अनुमान है।
परियोजना पूरी होने के बाद हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को बिजली उत्पादन में हिस्सेदारी मिलने की योजना है। इसके अलावा करीब 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने तथा पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए जल उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है।
उत्तराखंड में भी बड़ी संख्या में लोग होंगे प्रभावित
परियोजना से उत्तराखंड के नौ गांवों के करीब 3,406 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता होगी। यहां करीब 81,300 पेड़, 631 लकड़ी के मकान, 171 पक्के मकान, आठ मंदिर, दो अस्पताल, सात प्राथमिक विद्यालय, दो माध्यमिक विद्यालय और एक इंटर कॉलेज प्रभावित क्षेत्र में आने का अनुमान है।
किशाऊ परियोजना से जहां बिजली, सिंचाई और पेयजल जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देने की योजना है, वहीं प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास और विस्थापन का मुद्दा स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।




